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विकास साहू की कहानी: संघर्ष, सच और अकेले खड़े रहने की हिम्मत

गढ़वा निवासी 23 वर्षीय विकास साहू की सच्ची कहानी, जिन्होंने सितंबर 2025 से सामाजिक मुद्दों को सामने लाने का काम शुरू किया। इस रास्ते में उनका व्यवसाय बंद हुआ, परिवार पर संकट आया और उन्हें गहरी मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ी, फिर भी वे सच के साथ खड़े रहे।

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मैं विकास साहू हूँ। झारखंड के गढ़वा जिले का रहने वाला हूँ। मेरी उम्र 23 साल है। जो कुछ भी मैं यहाँ लिख रहा हूँ, वह मेरा अपना अनुभव है, मेरा अपना संघर्ष है और वही सच्चाई है जिसे मैंने जिया है।

पिछले एक साल से मैं सोशल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हूँ। शुरू में यह मेरे लिए सिर्फ एक माध्यम था, जहाँ मैं लोगों की बातें, उनके हालात और आसपास की सच्चाइयाँ सामने ला सकूँ। इससे पहले मैं करीब चार साल तक यूट्यूब पर व्लॉग्स बनाता रहा। उन व्लॉग्स के ज़रिए मैंने आम लोगों का जीवन, समाज की अच्छाइयाँ और उसकी कमियाँ, दोनों को नज़दीक से देखा। उसी दौरान मुझे यह समझ में आने लगा कि सिर्फ दिखाना काफी नहीं है, सवाल उठाना भी ज़रूरी है।

सितंबर 2025 से मेरी ज़िंदगी ने एक नया मोड़ लिया। इसी समय से मैंने गंभीर रूप से सामाजिक मुद्दों, अनियमितताओं और ज़मीनी सच्चाइयों को सामने लाने का काम शुरू किया। यह फैसला आसान नहीं था। मुझे पहले से अंदाज़ा था कि इस रास्ते पर चलना जोखिम से भरा होगा, लेकिन फिर भी मैंने पीछे हटना ठीक नहीं समझा।

इस दौरान मैंने एक एनजीओ से जुड़ी एक अहम बात को सामने रखा। उस मामले में जो कुछ मैंने देखा और समझा, उसे मैंने लोगों तक पहुँचाया। इसके बाद जो हुआ, उसने मेरी पूरी ज़िंदगी बदल दी। मुझे विरोध का सामना करना पड़ा, दबाव बनाया गया और अंततः मुझ पर शारीरिक हमला भी हुआ। वह समय मेरे लिए सिर्फ डर का नहीं था, बल्कि यह समझने का भी था कि सच के रास्ते पर चलने की कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।

इस काम का सीधा असर मेरे निजी जीवन पर पड़ा। मेरा चलता हुआ व्यवसाय बंद हो गया। मेरी दुकान, जो मेरे परिवार की रोज़ी-रोटी का सहारा थी, वह भी बंद हो गई। आर्थिक स्थिति बिगड़ गई। घर में तनाव बढ़ने लगा। मेरे घरवालों को ऐसी परेशानियों का सामना करना पड़ा, जिनके बारे में मैंने कभी सोचा भी नहीं था। अपनों को इस हालत में देखना मेरे लिए सबसे बड़ी पीड़ा थी।

मानसिक रूप से मैं पूरी तरह टूट चुका था। लगातार डर, तनाव, बदनामी और अकेलापन मेरे साथ रहने लगा। कई रातें बिना नींद के गुज़रीं। मन में बार-बार यही सवाल उठता रहा कि क्या सच बोलना इतना बड़ा अपराध है? क्या समाज के लिए खड़ा होना इतनी बड़ी सज़ा है?

इससे पहले भी मैंने ज़िंदगी में कई छोटे-मोटे काम किए हैं। मैंने कभी किसी काम को छोटा नहीं समझा। मेहनत करके जीना मैंने हमेशा सीखा है। संघर्ष मेरे लिए नया नहीं था, लेकिन सच के साथ खड़े रहने का संघर्ष सबसे ज़्यादा तकलीफ देने वाला साबित हुआ।

मेरा अनुभव यही कहता है कि ज़्यादातर लोग चाहते हैं समाज अच्छा बने, हालात सुधरें और गलत चीज़ें सामने आएँ। लेकिन जब उसी समाज के लिए जोखिम उठाने का वक्त आता है, जब नुकसान सहने की बारी आती है, तो बहुत से लोग पीछे हट जाते हैं। समर्थन बस शब्दों तक सीमित रह जाता है और जो सच बोलता है, वह अक्सर अकेला रह जाता है।

आज भी मैं यूट्यूब, फेसबुक, एक्स (ट्विटर), इंस्टाग्राम जैसे सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सक्रिय हूँ। मैं इस रास्ते पर किसी पहचान, शोहरत या फायदे के लिए नहीं चला हूँ। यह मेरे लिए सच के साथ खड़े रहने की लड़ाई है।

मैंने इस रास्ते में बहुत कुछ खोया है — अपना काम, अपनी आर्थिक स्थिरता, मानसिक शांति और अपनों की चिंता। लेकिन इसके बावजूद मैं रुका नहीं हूँ। आज भी मैं उसी विश्वास के साथ आगे बढ़ रहा हूँ कि सच चाहे जितना कठिन क्यों न हो, उसे सामने लाना ज़रूरी है।

यह कहानी सिर्फ मेरी नहीं है। यह हर उस इंसान की कहानी है जो बेहतर समाज की उम्मीद में अकेले खड़ा होता है, नुकसान सहता है, लेकिन फिर भी पीछे नहीं हटता।

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Vikash Kumar

Vikash Kumar | पत्रकार व लेखक | Varta By Vikash Sahu

Vikash Kumar एक स्वतंत्र पत्रकार और लेखक हैं, जो झारखंड और भारत से जुड़ी राजनीति, समाज, जनसमस्याओं और समसामयिक मुद्दों पर निष्पक्ष लेखन करते हैं।

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