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सुंदरगढ़ की खदानों के बीच विकास का सवाल: राउरकेला के पास गांवों में अब भी बुनियादी सुविधाओं की कमी

उड़ीसा के सुंदरगढ़ जिले में खनन से करोड़ों का राजस्व निकलने के बावजूद कई आदिवासी गांवों में सड़क, पानी और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी बनी हुई है। ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आए कई सवाल।

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उड़ीसा का राउरकेला शहर देश के प्रमुख औद्योगिक केंद्रों में गिना जाता है। साल 1959 में स्थापित राउरकेला स्टील प्लांट ने इस इलाके की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी और आज यह शहर राज्य का तीसरा सबसे बड़ा शहर माना जाता है। लेकिन इसी औद्योगिक विकास के बीच सुंदरगढ़ जिले के कई ग्रामीण और आदिवासी इलाकों की स्थिति आज भी चिंताजनक बताई जा रही है।

सुंदरगढ़ जिले में स्थित कुरमितर आयरन ओर माइंस, जिसे ओडिशा माइनिंग कॉरपोरेशन संचालित करती है और जहां 2021 से खनन का काम केआईओएल के माध्यम से किया जा रहा है, वहां के आसपास रहने वाले ग्रामीणों का कहना है कि खनन से अरबों रुपये का राजस्व निकलने के बावजूद उनके गांवों में अब भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है।

स्थानीय लोगों के अनुसार कई गांवों में आज भी पक्की सड़क, बेहतर शिक्षा व्यवस्था और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। ग्रामीण बताते हैं कि आजादी के 75 साल बाद भी कई परिवार बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि यह क्षेत्र केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्री रह चुके जुएल ओराम का संसदीय क्षेत्र भी रहा है, जिसके बावजूद स्थानीय लोग विकास की गति पर सवाल उठा रहे हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि खदानों से लगातार ट्रकों की आवाजाही के कारण सड़कों पर भारी जाम की स्थिति बन जाती है, जिससे आम लोगों को काफी परेशानी होती है। कई बार मरीजों को अस्पताल ले जाने में भी दिक्कतें सामने आती हैं। वहीं धूल और आयरन ओर के कणों के कारण आसपास के पेड़-पौधे और घर भी प्रभावित हो रहे हैं।

इसी इलाके में प्रस्तावित एक डैम को लेकर भी स्थानीय लोगों में नाराजगी देखी जा रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि यदि डैम बनता है और उसमें खनन से निकलने वाले अपशिष्ट को धोया जाता है, तो इससे आसपास की नदियों और जल स्रोतों पर असर पड़ सकता है, जिन पर हजारों आदिवासी परिवारों की आजीविका निर्भर है।

रिपोर्ट के दौरान यह भी सामने आया कि कई स्थानों पर पत्रकारों और स्थानीय लोगों को वीडियो रिकॉर्डिंग करने से रोका जाता है। कुछ लोगों का कहना है कि खनन परियोजनाओं के कारण विस्थापन का खतरा भी बना हुआ है।

हालांकि सरकार और कंपनियों की ओर से क्षेत्र में विकास और रोजगार के अवसर बढ़ाने के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कई ग्रामीण अब भी बेहतर सुविधाओं का इंतजार कर रहे हैं।

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जिस जमीन से करोड़ों-अरबों रुपये के खनिज निकल रहे हैं, क्या उसका लाभ कभी उन गांवों तक भी पहुंचेगा जहां के लोग आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

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Vikash Kumar

Vikash Kumar | पत्रकार व लेखक | Varta By Vikash Sahu

Vikash Kumar एक स्वतंत्र पत्रकार और लेखक हैं, जो झारखंड और भारत से जुड़ी राजनीति, समाज, जनसमस्याओं और समसामयिक मुद्दों पर निष्पक्ष लेखन करते हैं।

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