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ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले के लांजीबेर्ना में आदिवासी समुदाय डोलोमाइट और लाइमस्टोन खनन विस्तार के खिलाफ आंदोलन कर रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि उनकी जमीन, आजीविका और पहचान खतरे में है।

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लांजीबेर्ना भूमि आंदोलन: जल, जंगल, जमीन की रक्षा के लिए आदिवासियों का संघर्ष
लांजीबेर्ना भूमि आंदोलन: जल, जंगल, जमीन की रक्षा के लिए आदिवासियों का संघर्ष

 

ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले के लांजीबेर्ना क्षेत्र में आदिवासी समुदाय अपनी भूमि, आजीविका और पहचान की रक्षा के लिए लंबे समय से आंदोलन कर रहा है। आंदोलनकारियों का आरोप है कि डोलोमाइट और लाइमस्टोन खनन के विस्तार के नाम पर उनकी पुश्तैनी जमीन अधिग्रहित की जा रही है, जबकि स्थानीय लोगों की सहमति और ग्राम सभा के अधिकारों की अनदेखी की जा रही है।

लांजीबेर्ना क्षेत्र लंबे समय से सीमेंट उद्योग के लिए महत्वपूर्ण कच्चे माल का स्रोत रहा है। यहां से निकलने वाला लाइमस्टोन और डोलोमाइट राजगंगपुर स्थित सीमेंट उद्योगों को आपूर्ति किया जाता है। लेकिन स्थानीय आदिवासी समुदाय का कहना है कि इस विकास की कीमत उन्हें अपनी जमीन, खेती और भविष्य खोकर चुकानी पड़ रही है।

आंदोलन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता विनाधिक तिर्की का कहना है कि यह संघर्ष केवल जमीन का नहीं, बल्कि आदिवासी अस्तित्व का प्रश्न है। उनके अनुसार, "अगर जमीन नहीं बचेगी तो आदिवासी पहचान भी नहीं बचेगी। इसलिए यह आंदोलन हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य और हमारी सांस्कृतिक पहचान को बचाने की लड़ाई है।"

ग्रामीणों का दावा है कि कभी लांजीबेर्ना के खेतों में विभिन्न प्रकार की दालों और अन्य फसलों की खेती होती थी। लेकिन लगातार खनन गतिविधियों, पत्थर उत्खनन और भारी मशीनों के उपयोग के कारण कई क्षेत्रों की कृषि क्षमता प्रभावित हुई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जो भूमि कभी खेती के लिए उपजाऊ थी, वह अब धीरे-धीरे खनन क्षेत्र में बदलती जा रही है।

विरोध प्रदर्शन में बड़ी संख्या में महिलाएं, बुजुर्ग और युवा शामिल हो रहे हैं। भीषण गर्मी और लगभग 45 डिग्री सेल्सियस तापमान के बावजूद ग्रामीण आंदोलन स्थल पर डटे हुए हैं। उनका कहना है कि यह लड़ाई किसी आर्थिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि अपने बच्चों के सुरक्षित भविष्य और अपनी जमीन को बचाने के लिए लड़ी जा रही है।

आंदोलनकारियों का आरोप है कि उन्होंने राज्य सरकार और प्रशासन को कई बार अपनी समस्याओं से अवगत कराया है। उनका कहना है कि उनकी मांगों पर अभी तक संतोषजनक कार्रवाई नहीं हुई है। ग्रामीण चाहते हैं कि भूमि अधिग्रहण, खनन विस्तार और ग्राम सभा की सहमति से जुड़े सभी मामलों की निष्पक्ष जांच हो तथा प्रभावित परिवारों की चिंताओं को गंभीरता से सुना जाए।

हाल के महीनों में लांजीबेर्ना खनन विस्तार को लेकर तनाव कई बार सामने आया है। विभिन्न समाचार रिपोर्टों के अनुसार, ग्रामीणों ने भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया का विरोध किया और प्रशासन तथा पुलिस की मौजूदगी में प्रदर्शन भी हुए। ग्रामीणों का आरोप है कि खनन विस्तार से उनकी कृषि भूमि और जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। वहीं प्रशासन का कहना है कि विवादित मुद्दों पर बातचीत के माध्यम से समाधान निकाला जाना चाहिए।

लांजीबेर्ना का आंदोलन केवल एक गांव या एक परियोजना का मामला नहीं माना जा रहा। आदिवासी संगठनों का कहना है कि यह संघर्ष पूरे क्षेत्र में जल, जंगल और जमीन से जुड़े अधिकारों का प्रतीक बन चुका है। उनका मानना है कि विकास और उद्योगों की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन विकास ऐसा होना चाहिए जिसमें स्थानीय समुदायों के अधिकार, पर्यावरण और आजीविका सुरक्षित रहें।

आज लांजीबेर्ना के आंदोलनकारी यही सवाल उठा रहे हैं कि क्या विकास की कीमत आदिवासी समाज की जमीन, संस्कृति और अस्तित्व होगी, या फिर ऐसा रास्ता निकलेगा जिसमें विकास और अधिकार दोनों साथ चल सकें।

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    Vikash Kumar | पत्रकार व लेखक | Varta By Vikash Sahu

    Vikash Kumar एक स्वतंत्र पत्रकार और लेखक हैं, जो झारखंड और भारत से जुड़ी राजनीति, समाज, जनसमस्याओं और समसामयिक मुद्दों पर निष्पक्ष लेखन करते हैं।

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